मिर्ज़ा ग़ालिब की यादें

उनके देखे से जो आ जाती, 
    है मुँह पर रौनक, 
वो समझते है कि बीमार, 
   का हाल अच्छा है | 

बस खत्म कर ये बाज़ी, 
     इश्क़ ग़ालिब, 
मुक़द्दर के हारे कभी, 
 जीता नहीं करते | 

जब लगा था 
   ''तीर''
तब इतना दर्द न हुआ 
   ''ग़ालिब''
जख्म का एहसास तब हुआ जब 
   ''कमान''
देखी ''अपनों '' के 
   हाथो में...|     

 मशरूफ रहने का अंदाज़, 
तुम्हे तन्हा न कर दे ग़ालिब, 
   रिश्ते फुर्सत के नहीं, 
तवज्जो के मोहताज़ होते है | 

बहुत नुक्स निकालते है, 
 वो इस कदर हम में, 
जैसे उन्हें खुदा चाहिए था, 
और हम तो इंसान निकले |