ग़ालिब की यादें

दिल-ऐ-नादाँ तुझे हुआ क्या है | 
आखिर इस दर्द की दवा क्या है | | 

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'| 
शर्म तुमको मगर नहीं आती | | 

उनके देखने से जो आ जाती है मुँह पर रौनक | 
वो समझते है कि बीमार का हाल अच्छा है | | 
 
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया | 
वरना हम भी आदमी थे काम के | | 

 

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना | 
दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना | | 

दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई | 
दोनों को इक अदा में रजामंद कर गई  | |   

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ | 
मैं ना अच्छा हुआ ना बुरा हुआ | | 

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक | 
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होते तक | | 

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां |
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन | |  

मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का | 
उसी को देखकर जीते हैं जिस काफिर पर दम निकले | |