अल्फ़ाज़

आजकल वो हमसे डिजिटल नफरत करते हैं,
हमे ऑनलाइन देखते ही ऑनलाइन हो जाते हैं | 

बेवफा लोग बढ़ रहे हैं धीरे धीरे,
इक शहर अब इनका भी होना चाहिए | 

आँखे थक गई है आसमान को देखते देखते,
पर वो तारा नहीं टूटता, जिसे देखकर तुम्हें माँग लूँ | 

रूठूँगा अगर तुझसे तो इस कदर रूठूँगा की,
तेरी ये आँखे मेरी एक झलक को तरसेंगी | 

तुझसे अच्छे तो जख्म है मेरे,
उतनी ही तकलीफ देते है जितनी बर्दाश्त कर सकूँ | 

मेरी हर आह को वाह मिली है यहाँ,
कौन कहता है दर्द बिकता नहीं है | 

तुमने समझा ही नहीं और ना समझना चाहा,
हम चाहते ही क्या थे तुमसे ''तुम्हारे सिवा |

क्या बात बड़े चुपचाप से बैठे हो,
कोई बात दिल पे लगी है या कहीं दिल लगा बैठे हो | 

ना वो सपना देखो जो टूट जाए,
ना वो हाथ थामो जो छूट जाए | 

मत आने दो किसी को करीब इतना,
कि उससे दूर जाने से इंसान खुद से रूठ जाए |