ज़िंदगी

काश जिंदगी मेरी किताब होती,
जिक्र तुम्हारे पन्नो को मैं फाड़ देती |

स्याही जिस कलम की इस्तेमाल होती,
उस कांच की शीशी को उजाड़ देती |  
   

             सहारा क्यों दिया तुमने,
         जबकि खुद को मैं संभाल लेती | 
     हाँ गिरती कई बार, चुने मेरे रास्तो पर,
लेकिन विश्वास है मुझे, खुद को मैं संभाल लेती | 

दिखावे कि तुम्हारी उन बातो को,
काश, पहले ही मैं पहचान पाती | 

जाहिर कर देते वो राज़,
जो दिल में थे तुम्हारे | 

                 सच कहती हूँ ,
              अपने जिक्र को भी ,
तुम्हारी ( जिंदगी की ) किताब में टाल देती |