Mirza Ghalib Shayari

  इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया। 
वर्ना हम भी आदमी थे काम के।।  

 

          उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़।
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।। 

 काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'। 
शर्म तुम को मगर नहीं आती।। 

 

         दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है। 
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।। 

   इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'।
कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे।।  

 

 दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई। 
दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई।।  
 

  आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक। 
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक।।  

 

   इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना। 
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।।    

रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज। 
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं।।  

 

     रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज। 
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं।।