गुलज़ार शायरी

मिलता तो बहुत कुछ है इस ज़िन्दगी में,
​बस हम गिनती उसी की करते है जो हासिल ना हो सका।  

 

 

         मैं हर रात सारी ख्वाहिशों को खुद से पहले सुला देता
हूँ मगर रोज़ सुबह ये मुझसे पहले जाग जाती है। 

  वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर, 
आदत इस की भी आदमी सी है।   

 

 

           ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा, 
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा।   

  हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में, 
रुक कर अपना ही इंतिज़ार किया।  

   

 

           कुछ अलग करना हो तो भीड़ से हट के चलिए, 
भीड़ साहस तो देती हैं मगर पहचान छिन लेती हैं।

   मैं हर रात सारी ख्वाहिशों को खुद से पहले सुला देता
हूँ मगर रोज़ सुबह ये मुझसे पहले जाग जाती है।    

 

 

           मैंने दबी आवाज़ में पूछा? मुहब्बत करने लगी हो?
नज़रें झुका कर वो बोली! बहुत। 

 

    कोई पुछ रहा हैं मुझसे मेरी जिंदगी की कीमत,
मुझे याद आ रहा है तेरा हल्के से मुस्कुराना।    

 

 

                कभी जिंदगी एक पल में गुजर जाती हैं, 
और कभी जिंदगी का एक पल नहीं गुजरता।