अल्फ़ाज़

बेवफा लोग बढ़ रहे हैं धीरे धीरे,
इक शहर अब इनका भी होना चाहिए…

आज कल वो हमसे डिजिटल नफरत करते हैं,
हमें ऑनलाइन देखते ही ऑफलाइन हो जाते हैं..

ग़ालिब की यादें

दिल-ऐ-नादाँ तुझे हुआ क्या है | 
आखिर इस दर्द की दवा क्या है | | 

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'| 
शर्म तुमको मगर नहीं आती | | 

अल्फ़ाज़

आजकल वो हमसे डिजिटल नफरत करते हैं,
हमे ऑनलाइन देखते ही ऑनलाइन हो जाते हैं | 

बेवफा लोग बढ़ रहे हैं धीरे धीरे,
इक शहर अब इनका भी होना चाहिए | 

Mohabbat

औकात नही थी जमाने में जो मेरी कीमत लगा सके,
कमबख्त इश्क में क्या गिरे, मुफ्त में नीलाम हो गए |

बाजी- ऐ- मुहब्बत में हमारी बदकिमारी तो देखो,
चारो इक्के थे हाथ में, और एक बेगम से हार गए !

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